राहु का खगोलीय स्वरूप

राहु का खगोलीय स्वरूप राहु प्रकाश पिंड न होकर छाया ग्रह है। आकाश में इसकी कोई स्थिति नहीं है। वेदों और पुराणों में इसकी स्पष्ट उपलब्धि उल्लेख मिलता है। ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार चन्द्र-ग्रहण में भूकच्छाया और सूर्य ग्रहण में चन्द्रमा को ढकने वाले पदार्थ को राहु-केतु मानते हैं। कुछ विज्ञान लोग पृथ्वी की उत्तरी ध्रुव को राहु और दक्षिणी ध्रुव को केतु कहते हैं। ये दोनों ग्रह एक दूसरे 6 ग्रहों (180 डिग्री अंश) की दूरी पर रहते हैं तथा इनकी चाल सदैव 3/10/48 रहती है और ये वक्री (उलटी) गति से ही चलते हैं। आधुनिक गणना से 6798 दिन 16 घंटा 44 मिनट और 24 सेकंड में ये ग्रह द्वादश राशि को भोगते हैं। स्थूल मान से 18 वर्ष द्वादश राशि और 18 मास एक राशि 240 दिन एक नक्षत्र और 60 दिन तक एक नक्षत्र-पाद पर रहते हैं। विद्वानों के अनुसार पूर्णिमा के दिन चन्द्र और राहु का अन्त सात अंश से कम हो तो ग्रहण अवश्य होता है। दूसरे शब्दों में पृथ्वी की छाया जब चन्द्रमा पर आ जाता है तब प्रकाशहीन हो जाता है। इसी को "चन्द्र ग्रहण" कहते हैं। यदि चन्द्रमा का पूर्ण पिंड पृथ्वी की छाया में आए तब पूर्ण चन्द्र ग्रहण अधूरा पिंड छाया में आए तो खंड चन्द्र ग्रहण कहलाता है। जब पृथ्वी और सूर्य के बीच चन्द्रमा आ जाता है तब सूर्य का कुछ भाग नहीं दिखता है। यह "सूर्य ग्रहण" कहलाता है। सूर्य ग्रहण में सूर्य, चन्द्र तथा राहु का विचार किया जाता है। राहु दक्षिण दिशा का स्वामी है तथा अत्यन्त क्रूर माना जाता है। कुछ विद्वान् चढ़ते हुए चन्द्रपात को राहु और उतरते हुए चन्द्रपात स्थान को केतु कहते हैं। विष्णु पुराण के प्रथम अंश के नौवें अध्याय में प्रसंग आता है कि एक समय देवताओं और दानवों के बीच लम्बे समय तक युद्ध चला। भगवान विष्णु ने दोनों पक्षों से कुछ समय के लिए युद्ध रोकने का आग्रह किया है ताकि समुद्र मंथन किया जा सके। दोनों पक्ष इस पर राजी हो गए। समुद्र मंथन से जो कुछ निकला, उसे देवों और असुरों में वितरित किया जाना था। मंथन के लिए रस्सी के रूप में नागराज वासुकि को मंदरागिरी में लपेटा गया। इंद्र के नेतृत्व में देवतागण वासुकि की पूंछ और बलि के नेतृत्व में असुरगण मुंह पकड़कर मंथन करने लगे। समुद्र-मंथन में सबसे पहले घोर विष हलाहल निकला। भगवान शिव ने स्वेच्छा से हलाहल को पी लिया, लेकिन उन्होंने इसे अपने कंठ में ही रोके रखा। विष के प्रभाव से कंठ का रंग नीला हो गया। इसी कारण उन्हें नीलकंठ भी कहा जाता है। उसके बाद समुद्र से निकलने वालों में थे- कामधेनु, वारुणी, कल्पवृक्ष, अप्सराएं, चंद्रमा और लक्ष्मी। अंत में अमृत का प्याला लिए धन्वंतरि (औषधि के जन्मदाता) का आगमन हुआ। असुर अमृत के कलश लेकर भाग गए। तब भगवान विष्णु ने देवताओं के हित में मोहिनी का रूप धारण किया। असुर उसकी सुंदरता से मोहित हो गए और उसे ही अमृत बांटने का काम सौंप दिया। मोहिनी देवताओं में अमृत बांटने लगी। राहु नामक असुर ने अपनी मायाशक्ति से इस बात को जान लिया और रूप बदलकर देवताओं के साथ बैठ गया। उसने मुंह में अमृत ले लिया, लेकिन उससे पहले कि वह इसे निगल पाता, सूर्य और चंद्रमा ने इसे पहचान लिया। दोनों ने भगवान विष्णु से यह बात बताई। उन्होंने तत्काल अपने सुदर्शन चक्र से राहु का सिर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन राहु मुंह में अमृत ले चुका था, इसलिए वह धड़-विहीन होने के बावजूद भी जीवित रहा। तब से उसने सूर्य और चंद्रमा को माफ नहीं किया। है और अक्सर उन्हें ग्रस लेता है। इसी कारण सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण लगते हैं। धड़-विहीन होने के कारण राहु अधिक समय तक सूर्य या चंद्रमा को निगल कर नहीं रख सका, इसलिए कुछ समय बाद वे इसकी चुंगल से बाहर निकल आते हैं। कालांतर में राहु का सिर-विहीन धड़ केतु के नाम से जाना जाने लगा। पुराने ऋषियों ने रोचक कहानियों के माध्यम से सूर्य-चंद्र ग्रहण को समझाया। सूर्य को आकाश में जो गोल रास्ता है, वही भगवान विष्णु का चक्र है, क्योंकि समय की गणना उसी से की जाती है। उस काल चक्र को भगवान ने चंद्रमा के इशारे पर चलाया। इसका अर्थ यह है कि यह काल चक्र जिन दो बिन्दुओं पर चंद्रमा के रास्ते से मिला, वे ही राहु और केतु हैं। जब सूर्य और चंद्रमा दोनों राहु या केतु पर हों तो सूर्य ग्रहण होता है। जब एक राहु पर और एक केतु पर हो तो चंद्र ग्रहण होता है। ईसा की तीसरी सदी के आसपास ज्योतिष में सिद्धांत युग की शुरुआत हुई। सूर्य सिद्धांत में ग्रहण संबंधी गणना की विस्तृत विधि का उल्लेख किया गया है। इसी काल में इस बात का पता चला कि राहु और केतु चन्द्र के क्रमशः आरोही पात और अवरोही पात हैं, ये पृथ्वी की कक्षा के तल का प्रतिच्छेद करते हैं। इस प्रकार राहु और केतु चन्द्र-कक्षा और क्रांतिवृत्त के दो काल्पनिक छेदन-बिन्दु मात्र रह गए।